नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन को लेकर संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट ने दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के मुताबिक, वैश्विक तापमान आने वाले कुछ वर्षों में 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर सकता है। यह वही सीमा है, जिसे 2015 के पेरिस जलवायु समझौते के तहत वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित रखने का महत्वपूर्ण लक्ष्य माना गया था।
वैज्ञानिकों के अनुसार, धरती पहले ही पूर्व-औद्योगिक स्तर की तुलना में लगभग 1.4 डिग्री सेल्सियस गर्म हो चुकी है। ऐसे में तापमान में मामूली अतिरिक्त वृद्धि भी दुनिया के लिए गंभीर परिणाम लेकर आ सकती है।
कुछ वर्षों में पार हो सकती है 1.5°C की सीमा
UNEP की रिपोर्ट में पहली बार इस बात को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है कि 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को लंबे समय तक बनाए रखना अब बेहद मुश्किल नजर आ रहा है।
हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका मतलब जलवायु परिवर्तन से निपटने की कोशिशों को रोक देना नहीं है। उत्सर्जन में तेजी से कटौती जारी रखना जरूरी होगा। तापमान को जल्द से जल्द नियंत्रित करने और भविष्य में उसे कम करने की रणनीति पर काम करने की जरूरत बताई गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा परिस्थितियों में वैश्विक तापमान इस सदी के मध्य के आसपास करीब 1.8°C तक पहुंच सकता है। वहीं वर्तमान नीतियों के आधार पर वर्ष 2100 तक तापमान वृद्धि करीब 2.6°C तक पहुंचने का अनुमान है।
दशकों तक रह सकती है ज्यादा गर्म दुनिया
1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार होने के बाद दुनिया को लंबे समय तक अधिक गर्म परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। इससे अत्यधिक गर्मी, बाढ़, सूखा और अन्य मौसम संबंधी आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है।
इसके अलावा कृषि उत्पादन प्रभावित होने, पानी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ने और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचने की आशंका भी जताई गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक इसका सबसे ज्यादा असर गरीब और कमजोर आबादी पर पड़ सकता है।
ग्लेशियरों के पिघलने और समुद्र के बढ़ते स्तर का खतरा
जलवायु परिवर्तन का असर बर्फ की चादरों और ग्लेशियरों पर भी दिखाई दे रहा है। पश्चिमी अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड की बर्फ में होने वाला नुकसान भविष्य में समुद्र के जलस्तर को बढ़ा सकता है।
अमेजन जैसे महत्वपूर्ण वर्षावनों में बड़े बदलाव का खतरा भी बना हुआ है। वैज्ञानिकों का कहना है कि तापमान में हर अतिरिक्त दशमलव डिग्री की वृद्धि नुकसान को और बढ़ा सकती है।
इसलिए 1.5°C की सीमा पार होने की स्थिति में भी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तेजी से कटौती करना बेहद जरूरी होगा।
कार्बन डाइऑक्साइड हटाने पर भी देना होगा जोर
रिपोर्ट में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड हटाने की तकनीकों पर काम करने की जरूरत पर भी जोर दिया गया है।
पेड़ लगाना और वनीकरण कार्बन हटाने का महत्वपूर्ण प्राकृतिक तरीका है, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक केवल वनीकरण के जरिए तापमान को पर्याप्त स्तर तक कम करना संभव नहीं होगा। इसलिए कार्बन हटाने की नई और प्रभावी तकनीकों को विकसित करने की आवश्यकता होगी।
नेपाल जैसी आपदाओं से बढ़ी चिंता
जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चरम मौसम की घटनाएं चिंता बढ़ा रही हैं। नेपाल में हालिया बाढ़ और सैलाब से भारी नुकसान की खबरों ने भी इस बहस को और गंभीर बना दिया है।
हालांकि किसी एक प्राकृतिक आपदा को सीधे तौर पर केवल जलवायु परिवर्तन का परिणाम बताना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन बढ़ता तापमान, बदलते बारिश के पैटर्न और चरम मौसम की घटनाओं का बढ़ता जोखिम जलवायु परिवर्तन से जुड़ी व्यापक चिंता का हिस्सा है।
UNEP की चेतावनी का मूल संदेश साफ है—1.5°C की सीमा पार होने की आशंका के बावजूद जलवायु कार्रवाई रोकने के बजाय उसे और तेज करना होगा। तापमान जितना कम रखा जा सकेगा, भविष्य में होने वाले नुकसान और तबाही का जोखिम उतना ही कम किया जा सकेगा।














