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भूकंप से बचाव को लेकर बांध के मौजूदा डिजाइन को एडीबी ने इंटरनेशनल स्टैंडर्ड से अलग होने की बात कही

भूकंप से बचाव को लेकर बांध के मौजूदा डिजाइन को एडीबी ने इंटरनेशनल स्टैंडर्ड से अलग होने की बात कही

कुमाऊं के सबसे पुराने व बहुचर्चित प्रोजेक्ट जमरानी बांध को लेकर असमंजस की स्थिति पैदा हो चुकी है। एडीबी के एक सुझाव के चक्कर में केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय से दोबारा बांध निर्माण की अनुमति लेने की नौबत भी आ सकती है। भूकंप से बचाव को लेकर बांध के मौजूदा डिजाइन को एडीबी ने इंटरनेशनल स्टैंडर्ड से अलग होने की बात कही है।

एडीबी का कहना है कि इंटरनेशनल कमीशन आन लार्ज डैम (आइकोल्ड) के मानकों के हिसाब से डिजाइन तैयार करना चाहिए था। जबकि जमरानी परियोजना के अफसरों ने नेशनल कमेटी आन सिसमिक डिजाइन पैरामीटर (एनसीएसडीपी) से इस डिजाइन को अप्रूव कराया था। भारत के परिप्रेक्ष्य में बांधों के डिजाइन में भूकंप रोधी क्षमता का आकलन करने में एनसीएसडीपी को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है।

उत्तर प्रदेश के समय से जमरानी बांध का मामला चल रहा है। उत्तराखंड गठन के बाद भी लगातार बांध निर्माण के समर्थन में आवाज उठती रही। पिछले तीन साल में सर्वे और प्रस्ताव से जुड़े कामों में कुछ तेजी भी देखने को मिली थी। जनवरी की शुरूआत में प्रस्तावित बांध की जद में आने वाले इलाकों में भूमि अधिग्रहण की धारा-11 भी लागू कर दी गई।

इस धारा के लागू होने पर जमीन संबंधी खरीद-फरोख्त पर प्रतिबंध लग जाता है। क्योंकि, जमीन का इस्तेमाल जनहित से जुड़े एक अहम प्रोजेक्ट के लिए होना है। जनवरी अंत में स्विजरलैंड से एडीबी द्वारा भेजे गए विशेषज्ञों के दल ने सुरक्षात्मक लिहाज से बांध क्षेत्र का दौरा करने के साथ इससे जुड़े सभी डिजाइन का भी परीक्षण किया था। अब भूकंप रोधी क्षमता को लेकर एशियन डेवलेपमेंट बैंक ने आइकोल्ड के मानकों को डिजाइन में शामिल करने को कह दिया है। जिस वजह से असमंजस की स्थिति बन चुकी है।

पुराना डिजाइन नेशनल कमेटी आन सिसमिक डिजाइन पैरामीटर से पास हो चुका है। भारत से जुड़े मामलों में इस संस्था का सुझाव होता है। तकनीकी व डिजाइन में बदलाव होने पर नए सिरे से जमरानी बांध के प्रस्ताव को केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के पास भी अनुमति के लिए भेजना पड़ेगा। इन सब प्रक्रिया के पूरा होने में लंबा वक्त भी लग सकता है।

सिंचाई विभाग के सचिव एचसी सेमवाल का कहना है कि एडीबी के माध्यम से इस प्रोजेक्ट को बजट मिलना है। इसलिए उसकी शर्तों को पूरा करना जरूरी है। डिजाइन के तकनीकी भाग को लेकर कुछ निर्देश मिले हैं।

इस असमंजस की स्थिति से बाहर निकलने के लिए अफसरों ने एक प्लान तैयार किया है। इसके तहत आइकोल्ड के चेयरमैन मार्टिन वीलेंड को जमरानी बांध का वर्तमान डिजाइन भेजा जाएगा। जिसमें भूकंप के खतरे से बचाव का पूरा तकनीकी ब्यौरा होगा। जल्द यह डिजाइन अंतरराष्ट्रीय संस्था के अध्यक्ष के पास पहुंच जाएगा। इसके बाद आइकोल्ड की टिप्पणी का खासा महत्व रहेगा।

फंडिंग एजेंसी एडीबी के इस सुझाव को मानना आसान भी नहीं है। तकनीकी पहलू का असर वित्तीय तौर पर भी पड़ेगा। जमरानी परियोजना से जुड़े अफसरों के मुताबिक जमरानी बांध के डिजाइन में बदलाव करने पर बजट सीमा बढ़ सकती है। अगर यहां आइकोल्ड के हिसाब से काम किया गया तो देश की अन्य जगहों पर भविष्य में प्रस्तावित बांधों को लेकर भी ऐसे सुझाव आएंगे। ऐसे में असमंजस का दायरा और बढ़ेगा।

हल्द्वानी व आसपास के इलाके में पेयजल संकट दूर करने के लिए 1975 से इस बांध की कवायद चल रही है। बिजली उत्पादन के साथ-साथ इसे खेतों को सिंचाई के लिए पानी भी मिलेगा। जमरानी बांध के निर्माण के लिए 400 एकड़ जमीन की जरूरत है। इसमें फारेस्ट लैंड के अलावा निजी भूमि भी आ रही है। ग्रामीण विस्थापन के लिए सहमति दे चुके हैं। उनकी मांग किच्छा के प्राग फार्म में बसाने की है। इस प्रस्ताव पर फाइनल मुहर लगना अभी बाकी है। तिलवाड़ी, मुरकुडिया, गंदराद, पनियाबोर, उदुवा और पस्तोला गांव के लोगों का विस्थापन होना है।

 

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