मिजोरम में रीड सांप की नई प्रजाति की खोज, नाम रखा गया ‘कैलामरिया मिजोरमेंसिस’

आइजोल। पूर्वोत्तर भारत के राज्य मिजोरम में वैज्ञानिकों ने रीड सांप की एक नई प्रजाति की खोज कर बड़ी सफलता हासिल की है। मिजोरम यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों और रूस, जर्मनी व वियतनाम के शोधकर्ताओं की संयुक्त टीम ने इस नई प्रजाति की पहचान की है, जिससे लंबे समय से चली आ रही टैक्सोनॉमिक गलत पहचान भी सुधर गई है।

मिजोरम यूनिवर्सिटी के जूलॉजी विभाग के प्रोफेसर और रिसर्च टीम के प्रमुख एच.टी. लालरेमसांगा ने बताया कि इस नई प्रजाति का नाम राज्य के नाम पर ‘कैलामरिया मिजोरमेंसिस’ रखा गया है। इस खोज से जुड़े शोध परिणाम सोमवार को अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक जर्नल ज़ूटैक्सा में प्रकाशित किए गए हैं। यह अध्ययन डिटेल्ड मॉर्फोलॉजिकल जांच और डीएनए विश्लेषण पर आधारित है।

प्रोफेसर लालरेमसांगा के अनुसार अब तक यह नई प्रजाति केवल मिजोरम में ही कंफर्म हुई है, लेकिन इसके मणिपुर, नागालैंड और असम जैसे पड़ोसी राज्यों में मिलने की भी संभावना है। इसके अलावा बांग्लादेश के चटगांव क्षेत्र में भी इसके संभावित विस्तार को लेकर आगे और अध्ययन की जरूरत बताई गई है।

इस प्रजाति के नमूने पहली बार वर्ष 2008 में मिजोरम से एकत्र किए गए थे। पहले इन्हें दक्षिण-पूर्व एशिया में व्यापक रूप से पाई जाने वाली रीड सांप की एक प्रजाति का हिस्सा माना जा रहा था। लेकिन आइजोल, रीएक, सिहफिर, सॉलेंग, मामित और कोलासिब जिलों के जंगलों से जुटाए गए नमूनों के डीएनए विश्लेषण से यह साफ हो गया कि मिजोरम की आबादी अपने करीबी रिश्तेदारों से 15 प्रतिशत से ज्यादा आनुवंशिक रूप से अलग है, जो एक नई प्रजाति माने जाने के लिए पर्याप्त है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक यह सांप जहरीला नहीं है और इंसानों के लिए किसी तरह का खतरा नहीं पैदा करता। यह जमीन के अंदर रहने वाला, रात में सक्रिय होने वाला और छोटे आकार का सांप है। यह आमतौर पर नम, जंगली पहाड़ी इलाकों में पाया जाता है और इसे समुद्र तल से 670 से 1,295 मीटर की ऊंचाई के बीच रिकॉर्ड किया गया है।

दुनिया भर में कैलामरिया जीनस की अब तक 69 प्रजातियां पहचानी जा चुकी हैं। इनमें से अधिकांश प्रजातियां छोटी, छिपकर रहने वाली और कम अध्ययन की गई हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि ‘कैलामरिया मिजोरमेंसिस’ की खोज यह साबित करती है कि पूर्वोत्तर भारत के पहाड़ी और वन क्षेत्रों में अभी भी कई अनजानी प्रजातियां मौजूद हो सकती हैं, जिनके लिए लगातार जैविक सर्वे बेहद जरूरी है।