Advertisement

जब अटल बिहारी वाजपेयी अपने पिता के साथ एक ही क्लास में पढ़े

नई दिल्ली। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न Atal Bihari Vajpayee के जीवन से जुड़ा एक बेहद रोचक प्रसंग उनके छात्र जीवन का है। यह घटना उस समय की है जब वे पढ़ाई के लिए कानपुर पहुंचे और संयोग ऐसा बना कि उनके पिता भी उसी कॉलेज में उनके सहपाठी बन गए।

साल 1945–46 के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी ने DAV College Kanpur से राजनीति शास्त्र में एमए करने का फैसला किया। उस समय उनके पिता Krishna Bihari Vajpayee ग्वालियर रियासत में स्कूल के हेडमास्टर रह चुके थे और सेवानिवृत्त हो चुके थे। जब अटल जी ने कानून (एलएलबी) की पढ़ाई के लिए कानपुर जाने की बात कही, तो उनके पिता ने भी साथ पढ़ाई करने की इच्छा जताई। उनका मानना था कि ज्ञान प्राप्त करने की कोई उम्र नहीं होती।

इसके बाद पिता और पुत्र दोनों ने न सिर्फ एक ही कॉलेज में दाखिला लिया, बल्कि कानून की पढ़ाई के लिए एक ही सेक्शन में भी सहपाठी बन गए। इतना ही नहीं, दोनों कॉलेज के हॉस्टल के कमरा नंबर 92 में साथ रहते थे। उस समय के नियमों के अनुसार छात्र एक साथ एमए और एलएलबी की पढ़ाई कर सकते थे, इसलिए दोनों ने इन दोनों पाठ्यक्रमों में प्रवेश लिया।

बताया जाता है कि पिता के साथ पढ़ाई करते हुए अटल जी को थोड़ी झिझक महसूस होती थी। कई बार ऐसा होता कि जब उनके पिता क्लास में मौजूद होते तो अटल जी क्लास में नहीं जाते। ऐसे में शिक्षक उनके पिता से पूछते—“आपके पुत्र कहां हैं?”

वहीं जब उनके पिता क्लास में नहीं पहुंचते, तो शिक्षक अटल जी से पूछते—“आपके पिताजी कहां हैं?”। इस पर पूरी कक्षा में हंसी गूंज उठती थी।

क्लास में हाजिरी के समय जब प्रोफेसर “वाजपेयी” नाम पुकारते, तो पिता और पुत्र दोनों एक साथ खड़े हो जाते थे। इस स्थिति को देखते हुए शिक्षकों ने बाद में उनके नाम के आगे “पिता” और “पुत्र” जोड़कर बुलाना शुरू कर दिया।

हालांकि शिक्षकों को अपने से उम्रदराज छात्र कृष्ण बिहारी वाजपेयी को पढ़ाने में भी थोड़ी झिझक होने लगी। स्थिति को सामान्य बनाने के लिए बाद में दोनों के सेक्शन अलग कर दिए गए—एक को सेक्शन-ए और दूसरे को सेक्शन-बी में भेज दिया गया।

कुछ समय बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण कृष्ण बिहारी वाजपेयी को ग्वालियर लौटना पड़ा और उनकी पढ़ाई अधूरी रह गई। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी पढ़ाई जारी रखी और राजनीति शास्त्र में प्रथम श्रेणी के साथ एमए की डिग्री हासिल की।

यह किस्सा न सिर्फ अटल बिहारी वाजपेयी के छात्र जीवन की अनोखी याद है, बल्कि यह भी बताता है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती और शिक्षा के प्रति लगन किसी भी उम्र में व्यक्ति को प्रेरित कर सकती है।