सबरीमाला केस: अनुच्छेद 17 पर सुप्रीम कोर्ट में अहम टिप्पणी, जस्टिस नागरत्ना ने उठाया बड़ा सवाल

केरल के Sabarimala Temple में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रही सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता उन्मूलन) को लेकर अहम बहस देखने को मिली। इस मामले की सुनवाई 9 जजों की संविधान पीठ कर रही है, जिसमें Justice B. V. Nagarathna भी शामिल हैं।

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि किसी महिला को हर महीने कुछ दिनों के लिए “अछूत” माना जाए और फिर बाद में यह स्थिति समाप्त हो जाए। उनकी यह टिप्पणी अनुच्छेद 17 के संदर्भ में आई, जो ‘अस्पृश्यता’ को समाप्त करने की बात करता है।

इस अहम मामले की सुनवाई Chief Justice Surya Kant की अगुवाई वाली 9 जजों की बेंच कर रही है। पीठ में अन्य जजों के साथ जस्टिस नागरत्ना भी शामिल हैं। यह बेंच धार्मिक स्वतंत्रता और महिलाओं के अधिकारों के बीच संतुलन जैसे जटिल मुद्दों पर विचार कर रही है।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए Tushar Mehta ने कहा कि 2018 के फैसले में महिलाओं के प्रवेश पर रोक को ‘अस्पृश्यता’ मानना सही नहीं है। उनका कहना था कि सबरीमाला में यह प्रतिबंध मासिक धर्म से जुड़ा नहीं, बल्कि केवल एक विशेष आयु वर्ग (10 से 50 वर्ष) तक सीमित है।

दरअसल, 2018 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने महिलाओं के प्रवेश पर रोक को ‘अस्पृश्यता’ का एक रूप बताया था। इसी संदर्भ में अब बड़ी बेंच यह तय कर रही है कि क्या धार्मिक प्रथाओं में इस अनुच्छेद को लागू किया जा सकता है।

सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से Sabarimala Temple में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक करार दिया था। बाद में 2019 में इस मुद्दे को बड़ी बेंच को भेज दिया गया।

सबरीमाला केस अब सिर्फ एक मंदिर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता बनाम लैंगिक समानता और संविधान के मूल अधिकारों की व्याख्या का बड़ा प्रश्न बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला देशभर में धार्मिक प्रथाओं और महिलाओं के अधिकारों पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।