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राज्य में पांचवीं विधानसभा के गठन के लिए 10 मार्च को होने वाली मतगणना पर टिकी

राज्य में पांचवीं विधानसभा के गठन के लिए 10 मार्च को होने वाली मतगणना पर टिकी

राज्य में पांचवीं विधानसभा के गठन के लिए 14 फरवरी को हुए मतदान के बाद अब सबकी नजरें 10 मार्च को होने वाली मतगणना पर टिकी हैं। यदि 2017 को छोड़ दें तो 2002 से लेकर 2012 तक की विधानसभा गठन में नेता सदन के चयन में उप चुनाव की भी रवायत रही है। ऐसे में वर्तमान परिदृश्य में मतदाता से लेकर राजनीतिक दलों व उनसे जुड़े नेताओं की धड़कन बढऩा लाजिमी है।2000 में उत्तर प्रदेश पुनर्गठन के बाद नौ नवंबर को बने उत्तराखंड में अंतरिम विधानसभा का नेतृत्व नित्यानंद स्वामी ने किया था। हालांकि वह इस पद पर 21 अक्टूबर 2001 तक ही रहे। 30 अक्टूबर से एक मार्च 2002 तक भगत सिंह कोश्यारी राज्य के मुख्यमंत्री रहे। 2002 में पहली विधानसभा के लिए हुए चुनावों में 70 में से 36 सीटों पर विजय प्राप्त कर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई थी। पार्टी हाईकमान ने सांसद नारायण दत्त तिवारी को राज्य की बागडोर सौंपी थी। तब रामनगर क्षेत्र से विजयी योगंबर सिंह रावत ने तिवारी के लिए अपनी विधानसभा सदस्यता त्यागी। बाद में इस सीट पर उप चुनाव जीतने के बाद एनडी ने पूरे पांच साल तक सहज होकर सरकार चलाई।

2007 के चुनाव में 35 सीटों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। बाद में उत्तराखंड क्रांति दल सहित तीन निर्दलीयों की मदद से पार्टी हाईकमान ने मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) सांसद भुवन चंद्र खंडूड़ी को नेतृत्व सौंपा। उनके लिए धूमाकोट सीट से कांग्रेस के टिकट पर निर्वाचित ले. जनरल (सेवानिवृत्त) तेजपाल सिंह रावत ने त्यागपत्र दिया, जहां से उप चुनाव जीत खंडूड़ी सदन के सदस्य बने। 2012 के चुनावों के बाद राज्य ने अजब हाल देखा। इस चुनाव में कांग्रेस को 32 व भाजपा को 31 सीटों पर विजय हासिल हुई थी।

बीएसपी व उक्रांद (पी) के निर्वाचित सदस्यों की मदद से बहुमत जुटाकर कांग्रेस आलाकमान ने सदन का नेतृत्व सांसद विजय बहुगुणा को सौंपा। सितारगंज के विधायक किरण मंडल ने उनकी खातिर त्यागपत्र दिया। इस सीट पर हुए उप चुनाव में विजय हासिल कर विजय सिर्फ दो साल ही सरकार चला सके। 2014 में पार्टी आलाकमान से नेतृत्व की हरी झंडी मिलने के बाद हरीश रावत के लिए हरीश धामी ने धारचूला सीट छोड़ी। इस तरह एक बार फिर उप चुनाव के बाद सरकार की गाड़ी आगे चली। चौथी विधानसभा के गठन के लिए 2017 में हुए चुनावों में भाजपा 57 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। हालांकि त्रिवेंद्र सिंह रावत व तीरथ सिंह रावत के बाद मुख्यमंत्री का मुकुट पुष्कर सिंह धामी के सिर पर स्थिर रहा। यह बात अलग है कि त्रिवेंद्र के बाद सीएम बनाए गए सांसद तीरथ के सदन का सदस्य बनाने के लिए उप चुनाव होते-होते टला, क्योंकि राज्य की बागडोर एकाएक धामी के हाथ चली गई।

 

 

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