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टिहरी जल विद्युत परियोजना में कुल क्षमता का करीब एक तिहाई बिजली का उत्पादन हो रहा

टिहरी जल विद्युत परियोजना में कुल क्षमता का करीब एक तिहाई बिजली का उत्पादन हो रहा

भागीरथी नदी पर बनी टीएचडीसीआइएल (टिहरी जल विद्युत विकास निगम इंडिया लिमिटेड) की टिहरी जल विद्युत परियोजना में कुल क्षमता का करीब एक तिहाई बिजली का उत्पादन हो रहा है। सुबह और शाम पिकिंग ऑवर में नार्दन ग्रिड से मांग आने पर ही इस प्रोजेक्ट की टरबाइनें घूमती हैं। इस अवधि में रोजाना औसतन आठ से नौ मिलियन यूनिट बिजली पैदा की जाती है। सामान्य परिस्थतियों में यहां बिजली का उत्पादन नहीं किया जाता है। वैसे इस प्रोजेक्ट की प्रतिदिन 25 मिलियन यूनिट तक बिजली उत्पादित करने की क्षमता है।8392 करोड़ रुपये लागत के टिहरी हाइड्रो प्रोजेक्ट पर वर्ष 1978 में काम शुरू हुआ था। पहले चरण में 1000 मेगावाट के प्रोजेक्ट का काम पूरा होने के बाद वर्ष 2006 में यहां बिजली उत्पादन शुरू हुआ। दूसरे चरण में इतनी ही क्षमता के प्रोजेक्ट का निर्माण कार्य चल रहा है। इसके पूरा होने पर यह प्रोजेक्ट 2000 मेगावाट क्षमता का हो जाएगा।

दिलचस्प यह कि पहले चरण में निर्मित प्रोजेक्ट में वर्तमान में महीनेभर में 200 से 250 मिलियन यूनिट बिजली का ही उत्पादन हो रहा है। जो औसतन रोजाना आठ से नौ मिलियन यूनिट बैठता है। क्षमता की बात करें तो यहां कुल क्षमता के अनुरूप यहां 700 से 750 मिलियन यूनिट बिजली पैदा की जा सकती है। हालांकि, झील का जल स्तर 830 मीटर होने पर ही कुल क्षमता के बराबर उत्पादन संभव हो पाता है। साल में डेढ़-दो महीने ही यह स्थिति बन पाती है। झील में जल स्तर में कमी आने पर उत्पादन में गिरावट आ जाती है।टीएचडीसी इंडिया लिमिटेड के अधिशासी निदेशक यूके सक्सेना बताते हैं कि नार्दन ग्रिड की मांग पर ही प्रोजेक्ट में बिजली का उत्पादन किया जाता है। नार्दन ग्रिड से सामान्य तौर पर पिकिंग ऑवर (सुबह सात से दस बजे और शाम को सात से दस बजे) के मध्य बिजली की आपूर्ति की जाती है। सुबह और शाम इस अवधि में नार्दन ग्रिड की मांग औसतन चार से पांच मिलियन यूनिट रहती है। पांच मिनट के अलर्ट पर बिजली तैयार कर नार्दन ग्रिड को उपलब्ध कराई जाती है। दिन में कभी कभार जब भी नार्दन ग्रिड से बिजली की मांग आती है, उसे भी तत्काल पूरा कर दिया जाता है। हालांकि, प्रोजेक्ट को बिजली उत्पादन के लिए चौबीसों घंटे अलर्ट मोड पर रखा जाता है।

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