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बुरांश के फूल को रामगढ़ ब्लाक की रमा बिष्ट ने बनाया ग्रामीण महिलाओं की आजीविका का माध्यम

बुरांश के फूल को रामगढ़ ब्लाक की रमा बिष्ट ने बनाया ग्रामीण महिलाओं की आजीविका का माध्यम

स्वास्थ्य के लिए लाभदायक बताए जाने वाले बुरांश के फूल को रामगढ़ ब्लाक की रमा बिष्ट ने ग्रामीण महिलाओं की आजीविका का माध्यम बना दिया है। रमा 20 से अधिक गांवों की महिलाओं से बुरांश के फूल खरीद रही हैं। जिससे जैम, चटनी, जूस आदि तैयार कर बाजार में उपलब्ध करा रही हैं। बुरांश के फूलों का यह स्वरोजगार भले दो से तीन महीने के लिए सीमित है, मगर महिलाओं के लिए उम्मीद जगाने वाला है।नथुवाखान की रमा ने 2003 में स्वरोजगार की दिशा में काम शुरू किया। शुरुआत बागवानी से हुई। सेब, आडू, खुमानी, पूलम आदि प्रजाति के फलदार पौधों का बाग तैयार किया। कुछ साल बाद मुहिम आगे बढ़ी। रमा ने अपने बगीचे के अलावा आसपास के गांवों से फल खरीदने शुरू किए। फलों को प्रोसेसिंग कर कीवी, सेब, आडू, पूलम से जैम, चटनी व स्काश तैयार किया।

फिर बुरांश के फूलों से स्काश व जूस आदि बनाना शुरू किया। अब हर्बल चाय, गुलाब जल भी तैयार कर रही हैं। मौसम के अनुसार अलग-अलग व्यवसाय करती हैं। दूसरों के लिए प्रेरणा बनीं रमा ने काम के साथ पढ़ाई जारी रखी। स्नातकोत्तर की डिग्री के बाद सोशल वर्क में मास्टर डिग्री प्राप्त कर चुकी हैं।रमा का सारा काम हाथों से होता है। इस कारण हर मौसम में रमा आठ से 10 महिलाओं को प्रत्यक्ष रोजगार उपलब्ध कराती हैं। आसपास के गांवों के 50-60 लोग अप्रत्यक्ष रूप से स्वरोजगार की मुहिम से जुड़े हैं।

रमा ने 2010 में हर्बल खेती पर काम शुरू किया। देहरादून, पंतनगर का भ्रमण कर हर्बल खेती के बारे में जानकारी ली। रमा के हर्बल गार्डन में स्वीट बेसिल, सेज, स्टीविया, पेपर ङ्क्षमट, रोजमेरी, मारजोरम, रोज जिरेनियम, आरेगानो, थायम, पार्सली, लेमन बाम, पर्सले हर्ब, लेमनग्रास, केमोमाइल, अर्जुन, सौंप, कासनी, गिलोय, अश्वगंधा सहित अन्य जड़ी-बूटियों को उगाया है। इससे उत्पाद तैयार कर बेचती हैं।रमा स्थानीय बाजार के साथ आनलाइन माध्यम से उत्पाद बेचती हैं। कोरोना की वजह से दो वर्ष कारोबार प्रभावित रहा। इसके बाद भी हौसला नहीं छोड़ा। अब फिर से काम गति पकडऩे लगा है। रमा का कहना है कि नौकरी कम हो रही है। ऐसे में महिलाओं व युवाओं के लिए स्वरोजगार आय का अच्छा माध्यम हो सकता है।

 

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