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मुख्यमंत्री के रूप में धामी को स्वयं को राज्य के नेता के रूप में स्थापित करना होगा, ताकि सर्व स्वीकार्यता बनी रहे

मुख्यमंत्री के रूप में धामी को स्वयं को राज्य के नेता के रूप में स्थापित करना होगा, ताकि सर्व स्वीकार्यता बनी रहे

उत्तराखंड के सबसे युवा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बुधवार को शपथ ग्रहण के साथ ही लगातार दूसरी बार सरकार की कमान संभाल ली। पिछले वर्ष चार जुलाई को पहली बार मुख्यमंत्री बने धामी को चुनाव आदर्श आचार संहिता लागू होने से पहले केवल छह महीने का ही समय मिला। अब उनके सामने पांच साल का कार्यकाल है, जो उनकी कार्य कुशलता, रणनीतिक सोच और राजनीतिक चातुर्य की परीक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण रहेगा। ऐसे में सरकार का नेतृत्व करते हुए उन्हें कई तरह की चुनौतियों का सामना करना होगा।

राज्य के पांचवें विधानसभा चुनाव में दो-तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में आई भाजपा की सरकार के लिए राजनीतिक मोर्चे पर पहली चुनौती वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में शत-प्रतिशत सीटों के साथ जीत की हैट्रिक लगाने की होगी। वर्ष 2014 व 2019 के बाद अब वर्ष 2024 में भी वह लोकसभा की पांचों सीटों पर अजेय रहना चाहेगी।इस क्रम में उसे उन विधानसभा क्षेत्रों में अधिक कार्य करने की जरूरत है, जहां इस बार उसका मत प्रतिशत कम रहा। इसके अलावा विधानसभा चुनाव के घोषणा पत्र, जिसे पार्टी ने दृष्टि पत्र नाम दिया, में किए गए वायदों को अगले दो वर्ष में धरातल पर भी उतारना पार्टी के लिए आवश्यक होगा।लगभग साढ़े चार महीने पहले ही अपनी स्थापना के 21 वर्ष पूरा करने वाले उत्तराखंड को पुष्कर सिंह धामी के रूप में 12वें मुख्यमंत्री मिले हैं। राज्य गठन के बाद हर चुनाव में सत्ता बदलने के मिथक को तोड़ भाजपा ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाई है। पांच वर्ष की एंटी इनकंबेंसी के बावजूद भाजपा की सत्ता में वापसी किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं। हां, इतना जरूर है कि पिछली बार की अपेक्षा इस बार भाजपा की सीटें 57 से घटकर 47 पर आ गई हैं। अब जबकि सरकार के मुखिया के रूप में धामी ने कमान संभाल ली है, तो उनके समक्ष सबसे बड़ा लक्ष्य अपनी सरकार को पूरे पांच साल तक सफलता के साथ चलाना होगा।

अंतरिम सरकार सहित यह चौथा अवसर है, जब भाजपा की सरकार बनी है, लेकिन अब तक की तीन सरकारों में कोई भी मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। वर्ष 2017 में मुख्यमंत्री बने त्रिवेंद्र सिंह रावत का कार्यकाल ही इनमें सबसे लंबा रहा। वह तीन साल और 11 महीने से कुछ अधिक समय तक मुख्यमंत्री रहे। अंतरिम सरकार के समय पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी को लगभग 11 महीने और उनके बाद भगत सिंह कोश्यारी को पांच महीने का कार्यकाल मिला।वर्ष 2007 में सत्ता में आने पर भुवन चंद्र खंडूड़ी व डा रमेश पोखरियाल निशंक का कार्यकाल सवा दो-सवा दो साल रहा, जबकि खंडूड़ी का दूसरा कार्यकाल छह महीने चला। चौथे विधानसभा चुनाव में तीन-चौथाई बहुमत के साथ सत्ता में आने पर त्रिवेंद्र के बाद तीरथ सिंह रावत मुख्यमंत्री बने, जिन्हें चार महीने से भी कम समय मिला। इसके बाद पुष्कर सिंह धामी को सरकार की कमान मिली, जिन्हें आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू होने तक छह महीने मुख्यमंत्री के रूप में काम करने का अवसर प्राप्त हुआ।

इस भाजपा सरकार के सामने पहली बड़ी चुनौती वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में पिछले दो चुनाव की सफलता को दोहराने की रहेगी। मुख्यमंत्री के रूप में धामी को स्वयं को राज्य के नेता के रूप में स्थापित करना होगा, ताकि सर्व स्वीकार्यता बनी रहे। अगले दो साल में उन्हें स्वयं को उस स्तर तक ले जाना होगा कि भाजपा लगातार तीसरे लोकसभा चुनाव में पांचों सीटों पर परचम फहराए और वह इसमें सबसे बड़ी भूमिका निभाएं।वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के समय धामी सरकार दो साल का कार्यकाल पूर्ण कर चुकी होगी। इस स्थिति में संभव है कि भाजपा को इसकी एंटी इनकंबेंसी का सामना करना पड़े। मुख्यमंत्री के रूप में धामी को यह सुनिश्चित करना होगा कि सरकार की कमजोरियों का लाभ विपक्ष को न मिले। इसके लिए आवश्यक है कि कांग्रेस अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष को हावी होने का अवसर ही न दिया जाए।

वर्तमान में कांग्रेस की जो स्थिति है, वह भाजपा के लिए सुविधाजनक दिख रही है, लेकिन भविष्य में कांग्रेस मजबूत होकर उभर सकती है। ऐसे में भाजपा के समक्ष चुनौतियां बढ़ेंगी। कांग्रेस का जो भी नया नेतृत्व होगा, वह अपेक्षाकृत युवा होगा तो सक्रियता भी अधिक होगी। उसका एकमात्र उद्देश्य भाजपा सरकार की घेराबंदी ही रहेगा।इस स्थिति में यह जरूरी है कि मुख्यमंत्री और मंत्रियों के साथ ही नौकरशाही के मोर्चे पर भी ऐसा कुछ न हो, जो कांग्रेस के लिए अवसर उपलब्ध कराने का काम करे। उत्तराखंड में नौकरशाही के काम करने के तरीके अकसर चर्चा में रहते आए हैं। भाजपा सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि अगले पांच साल में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। नौकरशाही के बहाने कांग्रेस को भाजपा कोई राजनीतिक मुद्दा न थमाए।

एक और महत्वपूर्ण बात, जो भाजपा सरकार के लिए एक चुनौती के रूप में अगले पांच साल के दौरान सामने आएगी, वह है चुनाव घोषणा पत्र, जिसे पार्टी ने दृष्टि पत्र नाम दिया, के वायदों को धरातल पर उतारना। इनमें महंगाई पर नियंत्रण से लेकर रोजगार सृजन, बेहतर कानून व्यवस्था, महिला सशक्तीकरण, ग्राम्य विकास, सशक्त भू-कानून, समान नागरिक संहिता, बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा, ढांचागत विकास, प्रदेश की आर्थिकी में सुधार समेत अन्य विषय शामिल हैं। ये सभी विषय ऐसे हैं, जिन पर सरकार को पहले ही दिन से कार्य करते हुए दिखना होगा।

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