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उत्तराखंड में मुख्यमंत्री को लेकर अभी धुंधलका छटा नहीं

उत्तराखंड में मुख्यमंत्री को लेकर अभी धुंधलका छटा नहीं

उत्तराखंड में चुनाव परिणाम आए छह दिन हो गए हैं, लेकिन मुख्यमंत्री को लेकर अभी धुंधलका छटा नहीं है। पुष्कर सिंह धामी के अपनी विधानसभा सीट से चुनाव हार जाने के बाद नए मुख्यमंत्री को लेकर भाजपा में दून से लेकर दिल्ली तक विमर्श चल रहा है। धामी के चुनाव हारने से उनकी स्वाभाविक दावेदारी कमजोर पड़ी है, लेकिन मुख्यमंत्री के लिए जा रहे नामों में उनका नाम अब भी चर्चा में है। पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व मुख्यमंत्री के चयन को लेकर काफी गंभीर और सतर्क नजर आ रहा है। हो भी क्यों नहीं, गत कार्यकाल में राज्य को तीन-तीन मुख्यमंत्री मिले और प्रदेश भाजपा पर अनिश्चितता और अस्थिरता का आरोप चिपक गया। उत्तराखंड के लोगों को नए मुख्यमंत्री के नाम को लेकर हो रही देरी से बेचैनी तो हो रही है, लेकिन आम जन यह भी कह रहा है कि मुख्यमंत्री का नाम तय करने में दिन नहीं महीने लगा लो, लेकिन पांच साल चल सकने वाला मुख्यमंत्री दो।

उत्तराखंड में मुख्यमंत्री बदलते रहने की भाजपाई परंपरा पुरानी है। राज्य स्थापना के बाद बनी अंतरिम सरकार के डेढ़ साल के कार्यकाल में भी भाजपा ने पहले नित्यानंद स्वामी और अंतिम पांच माह के लिए भगत सिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाया। वर्ष 2007 के चुनाव में भाजपा को बहुमत मिला और सरकार बनी, लेकिन फिर राज्यवासियों ने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बारी-बारी से भुवन चंद्र खंडूड़ी, रमेश पोखरियाल निशंक और फिर खंडूड़ी को आसीन देखा। गत विधानसभा में 70 में से 57 सदस्यों का सुविधाजनक एवं ऐतिहासिक बहुमत मिला तो लगा मजबूत और स्थिर मुख्यमंत्री मिलेगा, लेकिन फिर पांच साल में तीन मुख्यमंत्री। इसीलिए इस चुनावी महासमर में कांग्रेस की तरकश में यह सबसे बड़ा और प्रभावी तीर था। इस चुनाव में कांग्रेस की सदस्य संख्या का 11 से 19 पहुंचने और मतों की हिस्सेदारी में लगभग साढ़े चार प्रतिशत की बढ़त पा लेने की वजह भी भजपा की यही नादानी या मजबूरी मानी जा रही है। यदि पहली बार मुख्यमंत्री का चयन गलत हो गया था, तो यह भांपने में भाजपा जैसी पार्टी को चार साल से ज्यादा क्यों लग गए।

पार्टी के फीडबैक मैकेनिज्म पर सवालिया निशान है। मुख्यमंत्री के चयन और बदलावों को लेकर पार्टी हाईकमान का सतही नजरिया और सतही तर्क कहीं न कहीं राज्यवासियों को कचोटता रहा है। जनादेश से साफ है कि राज्यवासी भाजपा को चाहते हैं, लेकिन मुख्यमंत्री को लेकर इस तरह की प्रयोगशाला बनना उन्हें ठीक नहीं लगता। केंद्र में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नरेन्द्र मोदी के नायकत्व पर झूमने वाला मतदाता अपने प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भी नायक देखना चाहता है। इस अपेक्षा में कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। मुख्यमंत्री को लेकर राज्यवासियों की दो कसौटियां हैं। वे मुख्यमंत्री को योग्यता, प्रशासनिक क्षमता, चाल-चरित्र के पैमाने पर कसते हैं। साथ ही भावनात्मक तराजू पर भी तौलते हैं।राज्यवासी अनुशासित और अहिंसक आंदोलनों से जन्मे उत्तराखंड के मुखिया की कुर्सी पर ऐसे व्यक्तित्व को देखना चाहता है, जो सच में वीरभूमि और देवभूमि का प्रतिनिधित्व करता हो। जो जनता के साथ सीधा संवाद स्थापित कर सके। जो जनअपेक्षाओं के अनुरूप विकास कार्यो को आगे बढ़ा सके। साथ ही जनभावना के अनुरूप आचरण भी कर सके।जाहिर है किसी भी मुख्यमंत्री के लिए समयबद्धता के साथ प्रशासनिक कार्य और जनता के साथ संवाद और सुलभता बनाए रखना कठिन कार्य होता है। जो दोनों कर ले जाए वही मुख्यमंत्री जननायक भी बन जाता है। यहां यह भी उल्लेखननीय है कि उत्तराखंड के मतदाता अकर्मण्य को माफ कर सकते हैं, लेकिन अहंकारी और भ्रष्ट को नहीं। हालांकि प्रदेश में यह मानने वाला वर्ग भी है, जो कार्य-प्रदर्शन के आधार पर मुख्यमंत्री बदलने के फैसलों को उचित मानता है। बुद्धिजीवियों का यह वर्ग मानता है कि पार्टी हाईकमान को मुख्यमंत्री के कार्यो का लगातार मूल्यांकन करते रहना चाहिए, आम जन से फीडबैक लेते रहना चाहिए और पैमाने पर खरा न उतरने पर बेहतर प्रदर्शन कर सकने वाले को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप देनी चाहिए।

किसी को भी मुख्यमंत्री का पद निरपेक्ष रूप से पांच साल के लिए नहीं दिया जा सकता है। यह कोई जमीन का पट्टा नहीं, जो लिख दिया तो लिख दिया। नेतृत्व कर सकते हो तो कुर्सी पर रहो वरना दूसरे के लिए खाली करो। इस परिणामोन्मुखी वर्ग का यह भी मानना है कि पार्टियां फिर ऐसा न कहें कि जिन्हें हटाया गया वे बहुत अच्छा काम कर रहे थे। जब अच्छा काम कर रहे थे तो बदले क्यों गए? जनता तो सब जानती है। टिकाऊ मुख्यमंत्री का अर्थ पांच साल चलने वाला नहीं, बल्कि पांच साल तक दौड़ने वाला होता है, यानी क्षमता और योग्यता वाला मुख्यमंत्री।

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