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चकराता  में हाईड्रम योजनाओं के बंद होने से कृषि भूमि बंजर होने की कगार पर

चकराता में हाईड्रम योजनाओं के बंद होने से कृषि भूमि बंजर होने की कगार पर

कालसी और चकराता ब्लॉक में हाईड्रम योजनाओं के बंद होने से कृषि भूमि बंजर होने की कगार पर पहुंच गई है। हाईड्रम योजना के बंद होने से काश्तकारों का खेतीबाड़ी करना मुश्किल हो गया है। पहाड़ में शासन स्तर से बजट नहीं मिलने के कारण सिंचाई के साधन अस्तित्व खोने लगे हैं। किसानों के लिए खेतों को बंजर होने से बचाना बड़ी चुनौती बन गया है।

जौनसार बावर परगने के कालसी और चकराता ब्लॉक क्षेत्र में 1700 हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने के लिए लघु सिंचाई विभाग की ओर से वर्ष 1986-87 में 13 हाईड्रम योजनाएं स्थापित की गईं थीं। वर्ष 2013 में आई प्राकृतिक आपदा से आधा दर्जन से अधिक योजनाएं क्षतिग्रस्त हो गईं। इनका छह साल बाद भी सुधारीकरण नहीं किया गया है। इसके चलते किसानों की खेतीबाड़ी महज बारिश पर निर्भर होकर रह गई है। चापनू, मलेथा-जड़वाला, साहिया छानी, बुहार खेड़ा, तारली गाड, कोटी गाड प्रथम, कोटी गाड द्वितीय, नराया, जोखला बोसान आदि योजनाएं बंद पड़ीं हैं।

उल्लेखनीय है कि जड़वाला में 30 परिवारों की 50 हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई के लिए 68.5 लाख रुपये खर्च कर हाईड्रम योजना स्थापित की थी। वहीं, साहिया छानी में 200 से अधिक परिवारों की 250 हेक्टेयर कृषि भूमि के लिए 36 लाख रुपये और कोटी गाड में 56 लाख रुपये की लागत से दो हाईड्रम योजनाएं शुरू की गईं थीं। जड़वाला के किसान संतन सिंह राठौर, मोहर सिंह ,चापनु के राजेश, कोटी गाड के टीकम सिंह ने बताया कि सिंचित जमीन के सिंचाई के अभाव में बंजर होने से मजदूरी कर गुजर बसर करनी पड़ रही है। अब सिर्फ बरसात में ही खेतीबाड़ी कर पा रहे हैं।

सभी योजनाएं केंद्र पोषित हैं, जिनके सुधारीकरण के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा गया है। बजट स्वीकृत होते ही सभी योजनाओं को सुचारु कर दिया जाएगा।
– रविन्द्र प्रसाद, अधिशासी अभियंता, लघु सिंचाई विभाग

यह है हाईड्रम योजना
क्षेत्र के किसी प्राकृतिक स्रोत से पानी को लिफ्ट कर पहाड़ों में खेतों तक पहुंचाया जाता है। इसमें मोटर लगी होती है। कालसी और चकराता ब्लॉक में क्षेत्र की नदी से पानी को लिफ्ट कर असिंचित भूमि तक पहुंचाया जा रहा था, लेकिन योजनाएं पूर्व में आई आपदा के दौरान क्षतिग्रस्त हो गईं। इसके बाद से इसे ठीक नहीं किया जा सका है।

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