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उत्तराखंड की राजनीति में आंतरिक कलह से मुक्त नहीं हो पाई कांग्रेस

उत्तराखंड की राजनीति में आंतरिक कलह से मुक्त नहीं हो पाई कांग्रेस

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2022 के चुनाव से ऐन पहले उत्तराखंड में कांग्रेस संगठन के भीतर धड़ेबंदी खुलकर सामने आ गई। राज्य बनने के 21 साल की अवधि में ऐसे मौके अब तक कई बार आ चुके हैं, जब पार्टी बिखरती दिखाई दी। प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने के बाद तेज होती रही गुटीय खींचतान का स्वरूप इस बार कुछ अलग है। तकरीबन पांच साल विपक्ष में रह चुकी कांग्रेस में इस बार सत्ता हासिल करने से पहले ही चेहरे को लेकर लंबे समय से चल रही खींचतान अब निर्णायक रूप लेती दिखाई दे रही है। महत्वपूर्ण यह है कि चुनाव के मौके पर तेज हुई रस्साकसी के केंद्र में एक बार फिर से हरीश रावत ही हैं।उत्तराखंड की राजनीति में कांग्रेस की शुरुआती दौर से ही मजबूत उपस्थिति रही है। साथ ही सच ये भी है कि पार्टी किसी भी दौर में आंतरिक कलह से मुक्त नहीं हो पाई। अगले विधानसभा चुनाव के लिए कमर कसकर हुंकार भर रहे प्रदेश संगठन के सामने एक बार फिर मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। प्रदेश में पार्टी के चुनाव अभियान की बागडोर संभाल रहे पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने जिसतरह तेवर तल्ख किए हैं, उससे आंतरिक धड़ेबाजी को एक बार फिर नए मोड़ पर ला दिया है।

प्रदेश में कांग्रेस की राजनीति पर मजबूत पकड़ रखने वाले हरीश रावत इससे पहले भी पार्टी के भीतर अपनी ताकत का एहसास कराते रहे हैं। 2002 में राज्य के पहले विधानसभा चुनाव में सत्ता में आई कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहे हरीश रावत को उस समय मायूसी हाथ लगी, जब उनके स्थान पर पंडित नारायण दत्त तिवारी की ताजपोशी मुख्यमंत्री पद पर हुई। हरीश रावत, उनके समर्थक विधायकों और संगठन पदाधिकारियों की नाराजगी को साधने में पार्टी को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। कुछ समय बाद ही पार्टी में कई धड़े बन गए थे, लेकिन बतौर मुख्यमंत्री तिवारी गुटीय संतुलन साधने में कामयाब रहे।2012 में भी कांग्रेस को गुटबंदी से जूझना पड़ा। तीसरे विधानसभा चुनाव में सत्ता में आई पार्टी ने मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी विजय बहुगुणा को सौंपी थी। कांग्रेस संगठन उस वक्त भी आपसी खींचतान का शिकार रहा। पार्टी हाईकमान के फैसले से असंतुष्ट हरीश रावत समर्थक गुट सरकार पर दबाव बनाए रहा। 2014 में हरीश रावत के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी कांग्रेस में असंतोष थम नहीं सका। दूसरे धड़ों की नाराजगी के चलते 2016 में पार्टी को बड़ी फूट का सामना करना पड़ा। कांग्रेस के 10 विधायकों ने ही अपनी सरकार के खिलाफ बगावत कर दी थी।

बगावत से सदमे में आई पार्टी को उस वक्त जोर का झटका लगा, जब बागी विधायकों के बाद पार्टी के कुछ अन्य बड़े नेताओं ने भी पार्टी को बाय-बाय कह दिया। 2017 के विधानसभा चुनाव के मौके पर गुटबंदी से कमजोर हुई कांग्रेस दोबारा सत्ता में वापसी नहीं कर सकी। कांग्रेस के बिखराव का परिणाम भाजपा को प्रचंड बहुमत मिलने के रूप में सामने आया। पिछले करीब पांच साल से प्रमुख प्रतिपक्षी पार्टी के रूप में भी कांग्रेस के भीतर एकदूसरे धड़े पर हावी होने की महत्वाकांक्षा खत्म नहीं हो पाई।चुनाव में करारी हार के बाद प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर बिठाए गए प्रीतम सिंह को चुनावी साल में इस पद से हाथ धोना पड़ा। इसे भी पार्टी के भीतर गुटीय खींचतान का नतीजा माना गया। पार्टी हाईकमान ने संतुलन साधने के लिए प्रदेश संगठन का नेतृत्व बदलने के साथ ही चार कार्यकारी प्रदेश अध्यक्षों की नियुक्ति भी कर दी। संगठन में हुए इस बड़े फेरबदल के बाद भी चुनाव के मौके पर चेहरे को लेकर पार्टी में चल रही रार थम नहीं सकी। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और उनके समर्थक उन्हें चुनाव में बतौर मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने की मांग करते रहे हैं। चुनाव की ओर कदम बढ़ा रही पार्टी में चेहरे और सामूहिक नेतृत्व की जंग ने अंदर पल रहे असंतोष को सतह पर ला खड़ा किया है।

 

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