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हाईकोर्ट के निर्णय को हैरान करने वाला निर्णय क्यूं कहा सुप्रीम कोर्ट ने

हाईकोर्ट के निर्णय को हैरान करने वाला निर्णय क्यूं कहा सुप्रीम कोर्ट ने

बुधवार 28 सितम्बर को जब नैनीताल हाईकोर्ट का ये फैसला आया की स्टिंग्बाज उमेश जे कुमार के खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमों को निरस्त किया जाय और उमेश की याचिका में लगाए आरोपों के आधार पर सीबीआई  मुख्यमंत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज करे तो पूरे प्रदेश में भूचाल आ गया .

न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी की एकलपीठ ने मंगलवार को उमेश की याचिका पर दिए फैसले में कहा कि याचिका (1187, उमेश जे कुमार बनाम उत्तराखंड राज्य, 2020) के पैरा आठ में लगाए आरोपों के आधार पर सीबीआई एफआईआर दर्ज करे।

अब सवाल उठ्ता है की आखिर जब उमेश ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर अपने ऊपर देहरादून थाने में दर्ज मुकदमा निरस्त करने की मांग की थी। जो उनके खिलाफ सेवानिवृत्त प्रो. हरेंद्र सिंह रावत ने नेहरू कॉलोनी थाने में ब्लैकमेलिंग सहित विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया था।तो कोर्ट ने मुख्यमंत्री का पक्ष जाने बिना इतना बडा फैसला कैसे सुना दिया .हालांकि न्यायालय के निर्णय पर किसी को कुछ बोलने का अधिकार नहीं है लेकिन कभी कभी इस तरह के फैसले न्यायालय की साख पर सवालिया निशान खडा करते है.
कोर्ट ने कहा की उसने उमेश की याचिका में की गई शिकायत का स्वत: संज्ञान लिया। है। सीएम रावत के खिलाफ लगे आरोपों की प्रकृति को देखते हुए यह जरूरी होगा कि सच सामने आए,लेकिन मुख्यमंत्री को पक्ष्कार बनाना जरुरी नही समझा ।वहीं दूसरी तरफ उमेश को सभी आरोपो से बरी कर दिया . इसीलिये सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे चौकाने वाला फैसला बताया .

जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली पीठ ने गुरुवार को कहा कि बगैर सीएम का पक्ष सुने ही हाई कोर्ट की तरफ से इस तरह का आदेश हैरान करने वाला है। रावत के वकील ने कहा की मुख्यमंत्री को सुने बगैर प्राथमिकी दर्ज नहीं की जा सकती। इस तरह का आदेश निर्वाचित सरकार को अस्थिर करेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई और दो पत्रकारों को नोटिस जारी कर चार हफ्ते में जवाब मांगा है। हाई कोर्ट ने सीबीआई को FIR दर्ज कर सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत पर लगे करप्शन के आरोपों की जांच करने का आदेश दिया था।सुप्रीम कोर्ट को दी गई मुख्यमंत्री की याचिका मे भी कहा गया है कि उमेश शर्मा ने हाईकोर्ट में स्वीकार किया था कि उसने डॉ. हरेन्द्र सिंह रावत और सविता रावत के जरिये रिश्वत लेने के और उनके मुख्यमंत्री के रिश्तेदार होने के गलत आरोप लगाए थे।  इसके बावजूद हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ सीबीआइ जांच के आदेश दिए। यहां तक कि हाईकोर्ट में उन्हें पक्षकार भी नहीं बनाया गया था। मुख्यमंत्री ने कहा है कि हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ जांच का आदेश देने से पहले उनका पक्ष सुनना भी जरूरी नहीं समझा… ऐसे मे हाईकोर्ट का आदेश बना रहने लायक नहीं है। हाईकोर्ट का आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है।

मुख्यमंत्री पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर व्‍हाट्स एप पर हुए कन्वरशेसन के आधार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए हैं।

यहां एक बडा सवाल ये भी उठ रहा है की उमेश शर्मा जैसे व्यक्ति जिसके खिलाफ कई फर्जीवाडे के मामलों में कई धाराओं में मुकदमे दर्ज है। उस पर गंभीर आरोप भी है। एसे व्यक्ति की शिकायत पर इतना बडा फैसला कैसे लिया गया .

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