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उत्तराखंड-आखिर हंगामा क्यो है बरपा

उत्तराखंड में कुछ लोग इन दिनो पत्रकारिता की नई परिभाषा गढ रहे है , इन फेसबुकिया पत्रकारो के लिये शब्दो का कोई अर्थ नही है जो जिसे ठीक लग रहा है लिख रहा है बोल रहा है . कुछ इतने हताश और निराश हो गये है की अब अंडे बेच कर गुजारा करने की बात तक कर रहे है . उत्तराखंड में कुछ न्यूज पोर्टल को विज्ञापन दिए जाने को लेकर कुछ मीडिया के साथियों ने ऐसा कोहराम मचाया कि जैसे आज से पहले किसी को विज्ञापन जारी ही न हुये हो . सरकार से विज्ञापन मिलना कोई नई बात नहीं है . ये सरकार का अपना विवेक है और अधिकार भी है की कब किसे कितना विज्ञापन दें राज्य बनने के बाद समाचार पत्रों और मीडिया के अन्य माध्यमों का उत्तराखंड में भी विस्तार हुआ है और कई लोगो को इस फील्ड में रोजगार भी मिला है .  अपने अपने संबंधों और बैनर के आधार पर सभी को विज्ञापन भी मिलते रहे हैं . लेकिन जिस तरीके से मीडिया के कुछ लोगों ने इस बार अपनी ही बिरादरी के लोगों के साथ बेहद गैरजिम्मेदाराना हरकतें की उसने उन्हें खुद ही कटघरे में खड़ा कर दिया है

. क्रिया की प्रतिक्रिया होना लाजिमी है अब देखिए जिन लोगों ने विरोध किया उनका पिछला लेखा जोखा भी सामने आ गया है .जो लोग चंद विज्ञापन दिए जाने का विरोध कर रहे थे . उन्होंने सरकार से लाखों रुपए डकार लिए . तो सवाल ये उठता है की क्या केवल हमेशा इन्हीं लोगों को फायदा मिलना चाहिए . वैसे तो आप सारे संगठन की हित की बात करते हो . तो फिर अपने ही लोगों के लिए इतनी ईर्ष्या का भाव.आपने ये कह कर हद ही कर दी की जिन लोगों को विज्ञापन मिलें हैं वे चरण वंदना कर रहे हैं  अगर ऐसा है तो आपके पिछले रिकॉर्ड देेेेेेेखकर तो ये यहीलग रहा है की आपसे बड़ा कोई चारण भाट है ही नहीं  . और शायद इसी लिये इतना तिलमिला गये है

एक प्रकार से अच्छा ही हुआ की आपने अपनो का विरोध किया …नही तो आपकी  इस कारगुजारी का भी कैसे पता चलता की खुद तो लाखो चट करके ड्कार तक नही लिया और जब  थोडा बहुत दूसरे साथियो को मिला तो  पर उपदेश बहुतेरे …वाह बहुत खूब..कौन पत्रकार है जिसने विज्ञापन न लिया हो . अरे विज्ञापन और पत्रकारिता का तो चोली दामन का साथ है . हमने तो एडिटर इन चीफ और खुद मालिकों को विज्ञापन के लिए सरकार से अनुरोध करते देखा है . और गलत भी क्या है .हर सरकार जनहित की योजनाओं को आमजन तक पहुंचाना चाहती है ताकि अधिक से अधिक लोगों को फायदा मिले . इस लिए विज्ञापन जारी करती है . अगर विज्ञापन लेना या देना इतना ग़लतहोता तो पत्रकारिता के छात्रों को ये अध्याय ही न पढ़ाया जाता.

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