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परिचर्चाः ‘अपणी बोली-अपणी भाषा उपेक्षित क्यों’

संवाददाता

गांव अब गांव जैसे नहीं रहे, वहां हल, बैल, नौले समाप्त हो गए हैं तो इनके लिए प्रयोग किए जाने वाले गढवाली-कुमाऊंनी शब्द कैसे बचेंगे? राजनेताओं द्वारा अपनी बोली का प्रयोग न करना, भाषा को रोजगार से न जोड़ पाना, घरों में प्रयोग न करना, संयुक्त परिवार का विघटन, संचार माध्यमों का प्रसार किंतु उनमें हमारी भाषाओं का स्थान नगण्य आदि कई कारण हैं, जो हमारी भाषा की उपेक्षा को जिम्मेदार हैं। बोली का प्रचार-प्रसार व्यापार, बाजार, मनोरंजन से होगा, केवल अकादमिक प्रयासों से ही नहीं।

गढ़वाली-कुमाऊंनी में बच्चों को प्रारम्भिक ज्ञान देने के लिए शंकर सिंह भाटिया ने अपणी बोली-अपणी भाषा पुस्तक संपादित की है।

हमारा मानना है कि हिन्दी, अंग्रेजी का ज्ञान जरूरी है, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपनी बोली का ज्ञान न रखें। यह जरूरी है कि हम अपनी भाषा को महत्व दें। यह बात ‘अपणी बोली, अपणी भाषा उपेक्षित क्यों’ विषय पर 4 जुलाई 2015 को सचिवालय परिसर में स्थित मीडिया सेंटर में आयोजित कार्यक्रम में दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के निदेशक डा. बी.के. जोशी ने कही। इस कार्यक्रम का आयोजन दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र ने किया। डा. बी.के. जोशी ने कहा कि यह चिंता की बाद है कि बच्चे अपणी बोली से दूर होते जा रहे हैं। उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभव को बताते हुए कहा कि हम पति-पत्नी आपस में कुमाऊंनी में ही बात करते हैं, लेकिन हमारे बच्चे हिन्दी-अंग्रेजी में ही बोलते हैं। पुस्तक के संपादक शंकर सिंह भाटिया ने बताया कि यूनेस्को के सर्वे से पता चलता है कि गढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी लुप्त होने की तरफ जा रही हैं। हमारा यह प्रयास होना चाहिए कि हम इन भाषाओं को आगे बढ़ाएँ। सरकार ने घोषणा की है कि कुमाऊंनी-गढ़वाली को स्कूली कोर्स में शामिल किया जाएगा, किन्तु जमीनी तौर पर सरकार ने इसके लिए कुछ नहीं किया है। उन्होंने बताया कि ‘अपणी बोली, अपणी भाषा’ किताब का उन्होंने संपादन किया है। पुस्तक में कुमाऊंनी-गढ़वाली-जौनसारी-रंग में एक ही वस्तु या भाव के लिए क्या शब्द प्रयोग होते हैं यह बताया गया है। उन्होंने यह भी बताया कि निजी क्षेत्र के स्कूल सोशल बलूनी पब्लिक स्कूल ने इस पुस्तक को अपने पाठ्यक्रम में शामिल करने का निर्णय लिया है। उन्होंने कहा कि हमें अपनी भाषाओं को संविधान की 8 वीं अनुसूची में शामिल करने के लिए लेखन व बोल चाल में अपनी भाषा को बढ़ावा देना होगा। गढ़वाली के जाने माने लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी ने चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि अपनी भाषा का यह सवाल सरकार से ज्यादा उत्तराखण्ड के लोगों का है, किन्तु जैसे दूसरे राज्यों ने वहां की क्षेत्रीय भाषाओं को संरक्षण दिया, वैसा हमारी सरकार ने नहीं किया। यहां के राजनैतिक नेतृत्व ने इस बारे में ध्यान नहीं दिया क्योंकि उस पर दबाव कभी यहां के लोगों ने नहीं डाला। उन्होंने कहा कि हमारे समाज में अपनी भाषा को लेकर आत्महीनता का भाव भी है, जो सही नहीं है। भाषा को अपनी अगली पीढ़ी तक ले जाना भी हमारी जिम्मेदारी है। नई पीढि़यों में व्यावसायिक पाठ्यक्रम की तरफ काफी रुझान है, हमारी अपनी भाषा से उन्हें रोजगार की संभावना नहीं दिखती है इसीलिए हम सरकार से मदद चाहते हैं कि सरकार इन भाषाओं को महत्व दे। उन्होंने कहा कि गढ़वाली-कुमाऊंनी में काफी साहित्य रचा जा रहा है, जौनसारी व अन्य में ऐसा नहीं है किंतु उन्हें निराश नहीं होना चाहिए बल्कि युवाओं को अपनी भाषा में लिखने के लिए प्रेरित करना चाहिए। वरिष्ठ लेखक रतन सिंह जौनसारी ने सवाल उठाया कि अपनी भाषा अपनी बोली के मामले में उत्तराखण्ड़ में यह सच्चाई है कि यहां केवल गढ़वाली-कुमाऊंनी ही नहीं रहते, यहां सैकड़ों जनजातियां हैं, पंजाबी हैं, नेपाली हैं वे चुप कैसे रहेंगे। यह एक बड़ी जटिलता है। जौनसारी में कहा कि गढ़वाली-कुमाऊंनी में रचना करते समय हिन्दी शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। यह कार्य जीवानन्द श्रीयाल ने अपनी रचनाएं ठेठ गढ़वाली में करके किया है। उन्होंने कहा कि जब यहां गढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी, रंग आदि भाषाएं हैं, तब राज्य की भाषा कौनसी भाषा होगी? इस पर सोचा जाना चाहिए। रतन सिंह जौनसारी ने बताया कि उन्होंने जौनसारी में कक्षा 1 व 2 को सामने रख कर किताबें तैयार की हैं वे काफी पसंद की गई किन्तु आगे के लिए कार्य ठप हो गया। उन्होंने बताया कि जौनसार, बावर व इनके बीच के हिस्से में बोली में अन्तर है, यह विभिन्नता गढ़वाली में भी है। इस बारे में विद्वजनों का सोचना चाहिए। जौनसारी भाषा के साथ विकट स्थिति है कि वहां उसमें साहित्य की रचना बहुत कम है, यदि यही हाल रहा तो जौनसारी के आगे अस्तित्व का सवाल खड़ा हो जाएगा। उन्होंने बताया कि बड़े प्रयास के बाद 4-5 युवा सामने आए हैं जो जौनसारी में लिख रहे हैं। कार्यक्रम का संचालन कर रहे डा. बी.के. जोशी ने बताया कि दुनिया के कुछ देशों में 2-2, 3-3 भाषाओं को राष्ट्र भाषा के तौर पर समान दर्जा दिया गया है और वहां उन सभी भाषाओं में राजकाज चलता है, उत्तराखंड में भी इस नीति का प्रयोग किया जा सकता है।

कुमाऊंनी साहित्यकार भारती पांडे ने कहा कि सरकार को गढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी भाषाओं को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए जिससे इसमें पठन-पाठन हो, अध्यापक हों, पुस्तकों की मांग हो। उन्होंने कहा कि गढ़वाली, कुमाऊंनी में बहुत सारे शब्दों में समरूपता है, जौनसारी का इनके साथ साख्य भाव है, इसलिए इन भाषाओं को मिलाकर एक नई भाषा बनाई जा सकती है, अपनी भाषा के शब्दों का हिन्दी में ज्यादा प्रयोग कर हम अपनी भाषा के शब्दों को बड़े क्षेत्र में प्रसारित कर सकते हैंै। दिनेश जोशी ने अपने विचार प्रस्तुत करते हुए सवाल किया कि अपनी बोली-भाषा उपेक्षित क्यों? अपनी बोली को प्रयोग करने में झिझक क्यों? शायद हीनता का बोध इसका कारण है कि कहीं मैं गंवार, पिछड़ा न समझा जाऊं। उन्होंने कहा कि जब हमारा समाज का स्वरूप ही समाप्त हो रहा है तो भाषा कैसे बचेगी। गांव अब गांव जैसे नहीं रहे, वहां हल, बैल, नौले समाप्त हो गए हैं तो इनके लिए प्रयोग किए जाने वाले गढवाली-कुमाऊंनी शब्द कैसे बचेंगे? उन्होंने बताया कि राजनेताओं द्वारा अपनी बोली का प्रयोग न करना, भाषा को रोजगार से न जोड़ पाना, घरों में प्रयोग न करना, संयुक्त परिवार का विघटन, संचार माध्यमों का प्रसार किंतु उनमें हमारी भाषाओं का स्थान नगण्य आदि कई कारण हैं, जो हमारी भाषा की उपेक्षा को जिम्मेदार हैं। बोली का प्रचार-प्रसार व्यापार, बाजार, मनोरंजन से होगा, केवल अकादमिक प्रयासों से ही नहीं। वरिष्ठ साहित्यकार वीणा पाणी जोशी ने कहा कि गढ़वाली-कुमाऊंनी भाषाएं समृ( हैं और इनमंे इतना साहित्य तथा लेखन है कि संविधान के आठवीं अनुसूची में स्थान पाने की हकदार हैं। उन्होंने कहा कि हिन्दी के प्रतिष्ठित होने के पहले ये बोलियां राजाश्रय पा चुकी थीं, राजतंत्र की भाषा बन चुकी थी। कार्यक्रम में दूसरे व अन्तिम भाग में जब श्रोताओं को सवाल पूछने के लिए आमंत्रित किया गया तो चकबंदी कार्यकर्ता कपिल डोभाल ने सीधा सवाल किया कि मैं अपनी बोली भाषा क्यों सीखूं?

प्रदीप कुकरेती ने सवाल उठाया कि राज्य बने 15 साल हो गए हैं क्या यहां के गीतकार-संगीतकारों ने गढ़वाली बोली के लिए कोई संयुक्त प्रयास किया है? इसके जवाब में नरेन्द्र सिंह नेगी ने बताया कि वे अपने साथियों के साथ मुख्यमंत्री के पास गए थे किंतु उनकी बात पर सरकार ने ध्यान नहीं दिया। फोटो ग्राफर कमल जोशी ने कहा कि बोली भाषा से पुराने लोक संस्कार जिन्दा रह सकते हैं। सेवानिवृत्त अधिकारी चतुर सिंह नेगी ने कहा कि पहले हमें स्वयं घरों में गढ़वाली-कुमाऊंनी का प्रयोग करना पड़ेगा तभी हम इन भाषाओं को बड़े स्तर पर मान्यता मिलने का दावा कर सकते हैं। वरिष्ठ साहित्यकार भगवती प्रसाद नौटियाल ने कहा कि जब मैं 7 साल का था तब दिल्ली चला गया, वहां उर्दू चलती थी किन्तु मैं आज तक गढ़वाली नहीं भूला। उन्होंने पूछा कि आप अपनी भाषा क्यों भूल रहे हैं? उन्होंने बताया कि 2005 में जब वे दिल्ली से देहरादून आए तो गढ़वाली हिन्दी की डिक्शनरी, राज्य 2011 की जनगणना में यहां के लोग अपनी मातृ भाषा गढ़वाली, कुमाऊंनी आदि लिखंे यह काम करने का संकल्प लिया था। उन्होंने बताया कि संविधान की 8 वीं अनुसूची में आने के लिए आपकी भाषा को साहित्य अकादमी पहचान देती है तो आप आधी लड़ाई जीत गए हैं। यह काम हो चुका है। अब हम राज्य सरकार पर दबाव बनाएं। यहां के तत्कालीन मंत्री मातबर सिंह कण्डारी ने इस बारे में काफी सहयोग किया। नौटियाल ने बताया कि जब उन्होंने डिक्शनरी तैयार करने के लिए गढ़वाल सभा में कार्य शुरू किया तो इसमें कई रोड़े अटकाए गए। तब गढ़वाली-हिन्दी-अंग्रेजी त्रिभाषा में डिक्शनरी तैयार की गई है। किन्तु यहां के संस्कृति विभाग ने ये किताबें अपने स्टोर में रखी हुई हैं, वह बेची नहीं जा रही हैं। उन्होंने बताया कि हमारी कोशिश संविधान की 8 वीं अनुसूची में लाने की ज्यादा होनी चाहिए क्योंकि इससे 8 वीं तक मातृभाषा में पढ़ाई अनिवार्य हो जाती है। इससे हमें बड़ा लाभ होगा। कार्यक्रम के अंत में दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के चन्द्रशेखर तिवारी ने सभी वक्ताओं, श्रोताओं, मीडिया सेन्टर सचिवालय के कार्मिकों व पत्रकारों का धन्यवाद किया।

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